▶1921 ई० में रायबहादुर साहनी ने हड़प्पा नामक स्थान पर सर्वप्रथम इस महत्वपूर्ण सभ्यता के अवशेषो का पता लगाया।
▶1922 ई० में राखलदास बनर्जी ने हडप्पा से 640 किमी० दूर स्थित मोहनजोदड़ो में उत्खनन के द्वारा एक भव्य नगर के अवशेष प्राप्त किये।
▶मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है -'मृतकों का टीला' है।
▶इसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग ने योजना बनाकर इस क्षेत्र में कुशलता पूर्वक उत्खनन का कार्य प्रारंभ किया अब जबकि इस सभ्यता के अवशेष सिंधु नदी की घाटी में दूर गंगा यमुना दोआब और नर्मदा ताप्ती के मुहानों तक प्राप्त हुए हैं।
सिंधु/हड़प्पा सभ्यता की विशेषतायें
नगर नियोजन
सड़के▶यह नगर बार-बार नष्ट हुुुआ।
और पुनः कम से कम सात बार निर्मित हुआ।
▶नगरों की सड़के सीधी और चौड़ी थीं तथा एक दूसरे को समकोण बनाती थीं।
▶मोहनजोदड़ो की मुख्य सड़क 10 मी० चौड़ी तथा 400 मी० लम्बी थी।
▶गलियों की चौड़ाई कम से कम 1 मी० से 3 मी० तक की थी।
भवन निर्माण योजना▶मक़ान पक्की ईटों के मुख्यतया सड़कों के किनारे बनाये गये थे। येे मकान एक मन्जिल तथा दो मन्जिल दोनों तरह के होते थे।
▶ये आकार में छोटे घरों से लेकर विशाल भवनों के आकार तक के होते थे।
▶नीचे की मन्जिल से ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनीं होती थीं।
▶प्रत्येक मकान में कुएं और स्नानागार होते थे।
▶अन्न के गोदाम भी नगरों में स्थित थे।
▶लोथल में एक विशाल भवन मिला है। इतिहासकरो का अनुमान है कि यह एक बंदरगाह था।
विशाल स्नानागार▶मोहनजोदड़ो में एक विशाल स्नानागार मिला है।
▶वह 180 फीट लम्बा तथा 108 फीट चौड़ा है।
▶इसकी बाहर की दीवारें लगभग 8 फीट मोटी हैं। इसके बीच में एक बड़ा चौकोर आँगन है, जिसके चारों ओर बैठने की ऊँची जगह और कमरे हैं।
▶चौकोर आँगन के मध्य तैरने के लिए एक बड़ा जलकुण्ड है जो 39 फीट लम्बा,23 फीट चौड़ा और लगभग 8 फ़ीट गहरा है।
▶इसके दोनों किनारों पर सीढ़ियो की श्रृंखलायें हैं। इसमें एक कुएं से जल आता था।
▶पानी को बाहर निकलने के लिए एक बहुत बड़ी ढकी नाली है।
नालियों का प्रबन्ध▶समस्त नालिया
पक्की ईटो की बनी थीं।
▶ईटो को परस्पर जोड़ने के लिए मिट्टी मिले चूने का प्रयोग किया गया था।
सामाजिक जीवन
सामाजिक संगठन▶यहाँ समाज चार विभागो में विभाजित था ।
▶विद्वान
▶योद्धा
▶व्यापारी
▶श्रमजीवी
वेशभूषा तथा वस्त्र▶हड़प्पा में प्राप्त मिट्टी और काँसे की मूर्तियो को देखकर
उस युग के निवासियो की वेशभूषा का पर्याप्त अनुमान लगाया जा सकता है।
नारियां कमर से ऊपर कमीज के समान कोई वस्त्र पहनती थीं।
स्त्रियों की दशा▶मातृ देवी की उपासना करना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ के निवासी स्त्रियों को विशेष सम्मान देते थे।
▶यहाँ के परिवार मातृ सत्तात्मिक होते थे। जिनमें स्त्रियों का ऊँचा स्थान होता था।
मृतक संस्कार▶खुदाई में प्राप्त अवशेषो का अध्ययन करनेे पर स्पष्ट हो जाता हैै कि
यहाँ तीन प्रकार से शव विषर्जन होता था।
▶या तो शव को भूमि में गाड़ दिया
जाता था।
▶या शव को पशु पक्षियों के खाने के लिए खुले में छोड़ दिया जाता था।
▶या शवों को अग्नि में जला दिया जाता था।
आर्थिक जीवन
कृषि▶हड़प्पा के निवासियो का मुख्य
व्यवसाय कृषि था।
▶यहाँ खुदाई में गेहूं और जौ भी मिले हैं।
▶अन्न के अतिरिक्त फलों की भी खेती होती थी।
▶कपास भी बोई जाती थी।
पशुपालन▶पशुओं के अस्थि पन्जरो से तथा मुुुद्राओ पर अंकित चित्र से ज्ञात होता है कि ये लोग गाय,भैस,बैल,भेड़, बकरी
आदि पालते थे।
शिकार▶माँस प्राप्त करने के लिये पशुओं का शिकार किया जाता था।
▶उसकी खाल व हड्डियों से विभिन्न वस्तुएं
बनायी जाती थीं।
गृह शिल्प तथा गृह उद्योग▶यहाँ वस्त्र
उद्योग पर्याप्त प्रगति पर था। सूती कपड़ो
का निर्माण प्रचुर मात्रा में किया जाता था।
▶सूती कपड़ो के साथ ऊनी कपड़े भी तैयार किये जाते थे।
▶ये वस्त्र विदेशों को भी भेजे जाते थे।
▶खुदाई में प्राप्त सोने,चाँदी, पीतल,ताँबा आदि के आभूषण इस बात के प्रमाण हैं कि यहाँ आभूषण बनाने का उद्योग पर्याप्त विकसित हो चुका था।
▶खुदाई में अनेक मिट्टी के घड़े,खिलौने मिले हैं।
जिससे यह ज्ञात होता है कि यहाँ कुम्भ कला का विकास चरम सीमा पर था।
धार्मिक दशा
मातृ देवी की उपासना▶जो मूर्तियां हड़प्पा में प्राप्त हुई हैं वे न्यूनतम नग्न हैं तथा जिनकी कमर मेंं पटका, मेंंखला और गले में हार है।
▶मातृ देवी की उपासना नर बलि द्वारा होती थी।
शिव पूजा या पशुपति की उपासना▶खुदाई में हड़प्पा मेंं एक मुुुुहर प्राप्त हुई है जिसमें एक पुरूष देवता की मूर्ति का अंकन है।
▶इस मूर्ति के तीन मुख तथा तीन नेत्र हैं।
पुरूष को योगासन में बैठा दिखाया है।
▶आसान के ठीक नीचे दो सींग वाला हिरन है।
▶मार्शल के अनुसार यह चित्र शिव का है।
लिंग और योनि पूजा▶खुदाई में अनेक छोटे बड़े पत्थरो के लिंग प्राप्त हुए हैैं यहाँ के लोग लिंग की उपासना करते थे।
▶खुदाई में चीनी मिट्टी और सीप के बने अनेक छल्ले प्राप्त हुए हैं।
▶ये छल्ले योनियों के हैं अतः यहाँ के लोग योनि उपासक भी थे।
वृक्ष पूजा और पशु पूजा▶हड़प्पा सभ्यता के निवासी वृक्ष पूजन भी करते थे।
पीपल तथा तुलसी की पूजा प्रमुख रूप से होती थी।
▶कुछ पशुओं को आधे मनुष्य तथा आधे पशु के रूप में दिखाया गया है तथा कुछ में मनुष्य को नाग पूजा करते दिखाया गया है।
▶बैल को श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता था।
प्रकृति पूजा▶हड़प्पा सभ्यता के निवासी प्राकृतिक पदार्थों का भी पूजन करते थे।
▶विशाल स्नानकुण्ड जल पूजा का प्रमाण है।सूर्य और अग्नि पूजा के भी प्रमाण मिले हैं।
कला का विकास
मूर्तिकला▶यहाँ पत्थर तथा काँसे की बनी हुई अनेक मूर्तियां मिली हैं।
▶धर्म संबंधी मूर्तियों में देवी-देवताओं, नर्तकियों,देवदासियों तथा योगियों की मूर्तियां हैं।
▶प्राप्त मूर्तियों में एक नर्तकी की मूर्ति अत्यधिक सुंदर तथा आकर्षक है।
▶नर्तकी त्रिभंगी मुद्रा में नृत्य करती दिखायी गयी है।
चित्रकला▶अनेक मुुहरो तथा बर्तनो पर बने चित्रों से ज्ञात होता है कि सिंधु घाटी केे लोग चित्रकला में अत्यधिक प्रवीण थे।
▶मुहरों पर साँड़ों और भैसो की सर्वाधिक कलापूर्ण ढंग से चित्रकारी की गयी है।वृक्षो के भी चित्र बनाये गए हैं।
मुद्रा कला▶खुदाई में अनेक मुहरें मिली है। ये मुुहरे भिन्न- भिन्न प्रकार के
पत्थरों,धातुओं तथा हाथीदाँत या मिट्टी की बनी होती थीं।अधिकतर मुद्रायें वर्गाकार
आकृति की हैं।
▶जिनपर एक ओर पशुओं के चित्र बने है तथा दूसरी ओर लेख लिखे हैं।
पात्र या कुम्भ निर्माण कला▶यहाँ विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तन बनायेे जाते थे जैसे - पानी रखने के घड़े,झाझरी तथा अनाज भरने के घड़े,मिट्टी के खिलौने।